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सहनशील है जनता

Posted On: 22 Sep, 2010 में

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करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता
आप के कपड़े में लगी नील है जनता

महंगाई बढ़ा करके हमें क्या दिया तोफा
टूटी हमारी खाट भी खुद ले लिया सोफा
कामन न रहा वेल्थ हेल्थ खेल का बिगड़ा
जिसमें है फंसा देश वो है कर्ज का पिजड़ा
इसको न जड़ बनाओ ये गतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता

फीका हुआ है आज अपनी चाय का प्याला
तुम छीनने लगे हो अब हर मुख का निवाला
तुम तो मनाओ दिवाली, अपना है दिवाला
सब कुछ तुम्हारी कैद में मस्जिद या शिवाला
इसको न सिखाओ, ये प्रगतिशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता

सबूत खरीदो भले ताबूत बेच दो
इस देश को आधा या तुम साबूत बेच दो
ईमान बेच दो भले सम्मान बेच दो
आदमी तो क्या तुम भगवान बेच दो
पर आपके ताबूत की भी कील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता

हैं दागदार कर्म पर बेदाग बने हो
रोटी के हर टुकड़े के लिए काग बने हो
इस देश के संगीत का तुम राग बने हो
आस्तीन के तुम जाने कब से नाग बने हो
भूलो नहीं कि बहुत ज्वलनशील है जनता
करते ही रहो जुल्म सहनशील है जनता

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
September 22, 2010

बेहतरीन रचना … बधाई ।

    Shrikant Singh के द्वारा
    September 27, 2010

    Thanks bhai.


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